Saturday, 8 October 2011

सरकार की नीयत में खोट

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए शुरू की गई जंग कठिन प्रयास के बावजूद निर्णायक मोड. पर पहुंचती नजर नहीं आती. इसके विपरीत कांग्रेस सरकार अन्ना टीम के खिलाफ गुपचुप तरीके से घात करने का नित नया षड़यंत्र रच रही है. भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन के दौरान सरकार के नुमाइंदे यह बहुत अच्छे से समझ चुके हैं कि सीधे तौर पर अन्ना हजारे जी के खिलाफ कुछ भी आरोप प्रत्यारोप करने से, उनकी अपनी नइया डूबने की अधिक संभावना है. इसलिए अब सरकार ने दोहरी रणनीति अपनाने का मन बनाया है. जिस प्रकार अनशन खत्म होने के ठीक बाद किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और यहां तक कि डॉ कुमार विश्वास को भी अलग-अलग मामलों में लपेटने और भ्रष्ट दिखाने की कोशिश की गई. सरकार की यह ओछी हरकत लोकतंत्र को दागदार करने वाली है. क्योंकि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार यहां प्रत्येक व्यक्ति को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा अधिकार है. ऐसे में हमारे देश को दीमक की तरह चाट रहे भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज बुलंद करने वालों को दबाने के लिए इस प्रकार की ओछी राजनीति निंदनीय है.
औपचारिकता पूरी करते हुए स्टैंडिग कमेटी के पाले में गेंद को फेंककर अब सरकार की कोशिश है कि किसी प्रकार अन्ना हजारे और उनकी टीम को नीचा और भ्रष्ट दिखाकर प्राप्त जनसमर्थन को छीना जा सके और फिर से अपनी मनमानी की जा सके. इन परिस्थितियों में अन्ना हजारे जी द्वारा 13 अक्तूबर से सभी राज्यों में भ्रमण करते हुए जनता से भ्रष्ट नेताओं को वोट न देने की अपील की और सरकार ने उनकी इस अपील को भी राजनीति से प्रेरित बता दिया. इस घटना क्रम ने सरकार के मंसूबों की पोल खोल कर रख दी है.
सबसे अहम बात यह है कि क्यों भ्रष्टाचार जैसे दीमक के खात्मे के लिए एक 70 वर्षीय उम्रदराज व्यक्ति को 10-12 दिन तक भूखा रहकर अपनी बात को रखना पड.ता है और सरकार द्वारा उल्टा उनकी आवाज दबाने के लिए हजार तरह के दांव पेंच लगाए जाते हैं. जबकि भ्रष्टाचार किसी एक की नहीं बल्कि देश में रहने वाले हर व्यक्ति के गले की फांस बना हुआ है. ऐसे में सरकार को अन्ना टीम की कमियों को न ढूंढकर सामूहिक प्रयास करते हुए भ्रष्टाचार को जड. से मिटाने के भरसक प्रयास करने चाहिए. उनके नेक इरादों को समझकर भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए थी.
अपने नैतिक कर्तव्यों को भूलकर जिस प्रकार सरकार गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए अन्ना जी के आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही है. उन्हें यह समझना चाहिए कि ये पब्लिक है, ये सब जानती है. अंदर क्या है बाहर क्या है, ये सब कुछ पहचानती है. यह बात सिर्फ सत्ताधारी पार्टी या सरकार पर लागू नहीं होती बल्कि विपक्ष हो या अन्य पार्टी, जिस तरह से सभी भ्रष्टाचार उन्मूलन आंदोलन को राजनीतिक तौर पर भुनाने की कोशिश जारी है. कुछ भी जनता से छिपा नहीं है.
हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा सरकार ने देश के विकास में काबिले तारिफ कार्य किया है. लेकिन अगर घडे. में छेद हो तो, भले उसे कितना भी भरते जाओ वो कभी नहीं भर पाएगा. इसके विपरीत कच्चा होकर फूट जाएगा. इसलिए आवश्यक है कि सरकार न सिर्फ देश के विकास को तवज्जो दे साथ ही भ्रष्टाचार रूपी दीमक के खात्मे की पूरी कोशिश करे. क्यों कि महंगाई, गरीबी, आतंकवाद सभी समस्याओं की जड. है भ्रष्टाचार. जब तक भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं होगा देश का सर्वांगीण विकास कभी संभव नहीं हो सकता.

1 comments:

अशोक कुमार शुक्ला said...

सिर्फ अफसरशाही को भ्रष्ट कहना पर्याप्त नही होगा । अफसर के रूप में
भर्ती होने वाला प्रत्यके ब्यक्ति इसी समाज से आता
है सो समाज की सामान्य गिरावट उसके ब्यवहार में आना स्वाभाविक है