एक लंबे अरसे बाद कलम उठाने की हिम्मत हुई. ऐसा लगता था मानो कलम रूठ ही गई हो मुझसे. निजी जीवन की उलझनों ने इस कदर जकड.ा कि अपनी पहचान भी धूमिल सी होने लगी थी. पर कहावत है ना देर आए दुरूस्त आए. सौभाग्य से वक्त रहते अपनी भटकी हुई राह को फिर से ूंढ पाई और मंजिल तक पहुंचने के लिए एक नये जोश को जगा पाई.
जुनून है कि अपनी काबलियत से किस्मत को भी घुटने टेकने को मजबूर कर सकूं. ख्वाहिश है अपनी कलम से वो क्रांति ला सकूं. जो न सिर्फ मेरी भावनाओं को अभिव्यक्ति दे, साथ ही समाज के हर वर्ग, हर जाति, हर समुदाय की समस्याओं को उजागर कर, कम से कम अपने स्तर पर सुझाव देकर समाधान के लिए रास्ता दिखा सकूं.
इस मुहिम में सबसे पहली कोशिश रहेगी, अपने वास्तविक मूल्यों को खो चुकी पत्रकारिता को फिर से जीवित करने की, बेबाकी से हर अन्याय को जुबां देने की. क्योंकि जीवन की उलझनों और परेशानियों में इतनी बुरी तरह जकड.ने का एक कारण यह भी रहा कि जिस जुनून से पत्रकारिता की शुरूआत की थी, जब हकीकत सामने आई तो वह इतनी भयानक थी कि अपनी पहचान कायम करना तो दूर अपने खुद के भावों को अभिव्यक्ति देना भी मुश्किल हो गया. क्योंकि अब ना ही पत्रकारिता रही और न ही पत्रकार. सबसे दुर्भागयपूर्ण तो यह है कि अन्याय के खिलाफ लड.ाई लड.ने वाला पत्रकार खुद ही अन्याय सहने को बाध्य है और खुद दलदल में फंसा व्यक्ति क्या किसी दूसरे को बचा पाएगा व न्याय दिला पाएगा. जी हां भले ही आज मीडिया भारतीय लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ माना जाने लगा है. पर दरअसल हकीकत यह भी है कि इस स्तंभ की नींव खोखली हो चुकी है. जातिवाद हो या क्षेत्रवाद हर तरह के अवसाद से ग्रस्त है मीडिया. शोाण सहना तो हर पत्रकार ने अपनी नियति मान लिया है. पर इसी बीच कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो अभी भी अपने अस्तित्व की लड.ाई लड. रहे हैं और अपनी राह से भटक चुके पत्रकारों को नींद से जगा रहे हैं.
पिछले दिनों एक सहयोगी और प्रिय मित्र के साथ घटी घटना ने सोचने को मजबूर कर दिया कि अगर नौकरी ही करनी थी तो किसी मल्टीनेशनल कंपनी या कॉलेज में प्रोफेसर बनकर 10 से 6 या 10 से 3 शिफट वालेशानदार प्रोफेशन को चुना होता. मेरे उस मित्र ने घर की विशम परिस्थितियों के बावजूद इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशन को छोड कर पत्रकारिता को चुना. हर वक्त एक अनोखे जुनून से भरा वो फक्कड., दुनिया उसे पागल और बड.बोला कहती है. उसके बड.बोले पन या यूं कहें सच्चाई को बेबाकी से कह देने के रवैये के कारण ही पिछले दिनो उसे बिना किसी कारण नौकरी से निकाल दिया गया.
घर की विशम परिथितियों के बावजूद ना ही बेरोजगारी उसकी कमर तोड. पाई और ना ही उसके जोश को ठंडा कर पाई. इतना ही नहीं कभी उसके माथे पर एक शिकन तक नहीं आई. तब आखिरकार किस्मत को उसके आगे घुटने टेकने ही पड.े. आज वह एक अच्छे संस्थान में कार्यरत है और अपनी लड.ाई को जारी रखे है. विकट परिस्थितियों से उबर कर नये जोश से खडे होने की उसकी कोशिश ने मेरी आत्मा को झकझोरा और फिर से अपने जुनून अपने सपने को पूरा करने की भावना में कंपन पैदा हुई. तब फैसला किया सभी लाचारी, बेबसी और मजबूरी को पीछे छोड.कर सबसे पहले अपने पत्रकारिता चुनने के निर्णय और सपने को सार्थक करना है, फिर कलम से उस क्रांति का आहवान करना है, जिसकी आज के इंसान और समाज को सख्त जरूरत है. इसी उम्मीद से एक बार फिर अपना सफर शुरू करने जा रही हूं. आशा करती हूं आप सभी का सहयोग मिलेगा.
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