Sunday, 8 January 2012

A SINCERE ATTEMPT ON GOVERNMENT PART IS REQUIRED TO ABOLISH CHILD LABOUR


It's been a quarter of a century since India banned Child Labour in hazardous work. And it's been many years that the country has banned child labour. Yet, the country still holds the record of the largest employer of children in the world. This goes against the growing stature of India as an economic superpower. The occasion of World Anti Child Labour Day is the time to reevaluate our law and programmes, that promise children a better life.


Child labor is widely prevalent in some form or the other, all over the world. According to the International LaborOrganization (ILO) approximately 246 million children between the age of five and 15 are engaged as child labour. However, India is leading with 12.6 million children in that age group employed in economic activities.

Some Non-Government Organizations are active in ending the system by mainstreaming these children into education. Such as, 12-year old Gopal who used to work as a rag-picker now studying in a Non Formal Education center and willing to do a respectable job in future.

"Earlier I used to pick rag. Now I don’t do that work. Now I go to school, then tuition. I want to do a good job when I grow up. I used to get only 10-20 rupees a day picking rags," said he.

But unfortunately not all are as lucky as Gopal. They are involved in domestic work, factory work, agriculture, mining work or business like selling food and many other hazardous works to meet the ends. To end this a lot more needs to be done on government and social level, as present legislation seemingly is not yielding much results.

The government has made education a fundamental right of children. But many, like activist Swami Agnivesh, who is working for Bonded Labour Liberation Front, find that at ground level there is not much of difference in the scenario.

"Very recently education became a fundamental right and the government now talks about free and compulsory education for all children but this is only something which the government prefaces. But in practice it is being really failed. It is not being sincerely implemented. The government owns plea that there are not sufficient budget, there is not much water in this. Therefore we have been fighting and fighting the best to abolish all forms of child labor and child bonded labor system to provide good quality and full time formal education to all children," said swami Agnivesh.

On the other hand National Commission for Protection of Child Right consider child labour as a grave human issue and finds loopholes in Child Labour Prohibition and Regulation Act, 1986 behind the increasing number ofchild labour. To take effective steps NCPCR has submitted an Action Plan to Delhi Govt. Now High Court has directed government to implement this plan with immediate effect for making education a reality for every child.

Lov Verma, Secretary, National Commission for Protection of Child Right said, "As far as NCPCR is concerned we appointed a working group in 2008 and we have come up with recommendation which we have shared with the Government authorities and we are trying to push them, get them to be adopted. On that we have said that the definition of a child should be till 18 years of age. And all forms of child labour should be abolished."

Education is seen as the biggest antidote to this social evil. Yet, so far efforts have yielded very little results, despite government legislations. However, voices across social spectrum are crying out for a more plausible solution. Is there an end is sight? that's for time to tell.

Saturday, 8 October 2011

सरकार की नीयत में खोट

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए शुरू की गई जंग कठिन प्रयास के बावजूद निर्णायक मोड. पर पहुंचती नजर नहीं आती. इसके विपरीत कांग्रेस सरकार अन्ना टीम के खिलाफ गुपचुप तरीके से घात करने का नित नया षड़यंत्र रच रही है. भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन के दौरान सरकार के नुमाइंदे यह बहुत अच्छे से समझ चुके हैं कि सीधे तौर पर अन्ना हजारे जी के खिलाफ कुछ भी आरोप प्रत्यारोप करने से, उनकी अपनी नइया डूबने की अधिक संभावना है. इसलिए अब सरकार ने दोहरी रणनीति अपनाने का मन बनाया है. जिस प्रकार अनशन खत्म होने के ठीक बाद किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और यहां तक कि डॉ कुमार विश्वास को भी अलग-अलग मामलों में लपेटने और भ्रष्ट दिखाने की कोशिश की गई. सरकार की यह ओछी हरकत लोकतंत्र को दागदार करने वाली है. क्योंकि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार यहां प्रत्येक व्यक्ति को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा अधिकार है. ऐसे में हमारे देश को दीमक की तरह चाट रहे भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज बुलंद करने वालों को दबाने के लिए इस प्रकार की ओछी राजनीति निंदनीय है.
औपचारिकता पूरी करते हुए स्टैंडिग कमेटी के पाले में गेंद को फेंककर अब सरकार की कोशिश है कि किसी प्रकार अन्ना हजारे और उनकी टीम को नीचा और भ्रष्ट दिखाकर प्राप्त जनसमर्थन को छीना जा सके और फिर से अपनी मनमानी की जा सके. इन परिस्थितियों में अन्ना हजारे जी द्वारा 13 अक्तूबर से सभी राज्यों में भ्रमण करते हुए जनता से भ्रष्ट नेताओं को वोट न देने की अपील की और सरकार ने उनकी इस अपील को भी राजनीति से प्रेरित बता दिया. इस घटना क्रम ने सरकार के मंसूबों की पोल खोल कर रख दी है.
सबसे अहम बात यह है कि क्यों भ्रष्टाचार जैसे दीमक के खात्मे के लिए एक 70 वर्षीय उम्रदराज व्यक्ति को 10-12 दिन तक भूखा रहकर अपनी बात को रखना पड.ता है और सरकार द्वारा उल्टा उनकी आवाज दबाने के लिए हजार तरह के दांव पेंच लगाए जाते हैं. जबकि भ्रष्टाचार किसी एक की नहीं बल्कि देश में रहने वाले हर व्यक्ति के गले की फांस बना हुआ है. ऐसे में सरकार को अन्ना टीम की कमियों को न ढूंढकर सामूहिक प्रयास करते हुए भ्रष्टाचार को जड. से मिटाने के भरसक प्रयास करने चाहिए. उनके नेक इरादों को समझकर भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए थी.
अपने नैतिक कर्तव्यों को भूलकर जिस प्रकार सरकार गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए अन्ना जी के आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही है. उन्हें यह समझना चाहिए कि ये पब्लिक है, ये सब जानती है. अंदर क्या है बाहर क्या है, ये सब कुछ पहचानती है. यह बात सिर्फ सत्ताधारी पार्टी या सरकार पर लागू नहीं होती बल्कि विपक्ष हो या अन्य पार्टी, जिस तरह से सभी भ्रष्टाचार उन्मूलन आंदोलन को राजनीतिक तौर पर भुनाने की कोशिश जारी है. कुछ भी जनता से छिपा नहीं है.
हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा सरकार ने देश के विकास में काबिले तारिफ कार्य किया है. लेकिन अगर घडे. में छेद हो तो, भले उसे कितना भी भरते जाओ वो कभी नहीं भर पाएगा. इसके विपरीत कच्चा होकर फूट जाएगा. इसलिए आवश्यक है कि सरकार न सिर्फ देश के विकास को तवज्जो दे साथ ही भ्रष्टाचार रूपी दीमक के खात्मे की पूरी कोशिश करे. क्यों कि महंगाई, गरीबी, आतंकवाद सभी समस्याओं की जड. है भ्रष्टाचार. जब तक भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं होगा देश का सर्वांगीण विकास कभी संभव नहीं हो सकता.

Thursday, 6 October 2011

सफर की एक नई शुरूआत

एक लंबे अरसे बाद कलम उठाने की हिम्मत हुई. ऐसा लगता था मानो कलम रूठ ही गई हो मुझसे. निजी जीवन की उलझनों ने इस कदर जकड.ा कि अपनी पहचान भी धूमिल सी होने लगी थी. पर कहावत है ना देर आए दुरूस्त आए. सौभाग्य से वक्त रहते अपनी भटकी हुई राह को फिर से ूंढ पाई और मंजिल तक पहुंचने के लिए एक नये जोश को जगा पाई.

जुनून है कि अपनी काबलियत से किस्मत को भी घुटने टेकने को मजबूर कर सकूं. ख्वाहिश है अपनी कलम से वो क्रांति ला सकूं. जो न सिर्फ मेरी भावनाओं को अभिव्यक्ति दे, साथ ही समाज के हर वर्ग, हर जाति, हर समुदाय की समस्याओं को उजागर कर, कम से कम अपने स्तर पर सुझाव देकर समाधान के लिए रास्ता दिखा सकूं.

इस मुहिम में सबसे पहली कोशिश रहेगी, अपने वास्तविक मूल्यों को खो चुकी पत्रकारिता को फिर से जीवित करने की, बेबाकी से हर अन्याय को जुबां देने की. क्योंकि जीवन की उलझनों और परेशानियों में इतनी बुरी तरह जकड.ने का एक कारण यह भी रहा कि जिस जुनून से पत्रकारिता की शुरूआत की थी, जब हकीकत सामने आई तो वह इतनी भयानक थी कि अपनी पहचान कायम करना तो दूर अपने खुद के भावों को अभिव्यक्ति देना भी मुश्किल हो गया. क्योंकि अब ना ही पत्रकारिता रही और न ही पत्रकार. सबसे दुर्भागयपूर्ण तो यह है कि अन्याय के खिलाफ लड.ाई लड.ने वाला पत्रकार खुद ही अन्याय सहने को बाध्य है और खुद दलदल में फंसा व्यक्ति क्या किसी दूसरे को बचा पाएगा व न्याय दिला पाएगा. जी हां भले ही आज मीडिया भारतीय लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ माना जाने लगा है. पर दरअसल हकीकत यह भी है कि इस स्तंभ की नींव खोखली हो चुकी है. जातिवाद हो या क्षेत्रवाद हर तरह के अवसाद से ग्रस्त है मीडिया. शोाण सहना तो हर पत्रकार ने अपनी नियति मान लिया है. पर इसी बीच कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो अभी भी अपने अस्तित्व की लड.ाई लड. रहे हैं और अपनी राह से भटक चुके पत्रकारों को नींद से जगा रहे हैं.

पिछले दिनों एक सहयोगी और प्रिय मित्र के साथ घटी घटना ने सोचने को मजबूर कर दिया कि अगर नौकरी ही करनी थी तो किसी मल्टीनेशनल कंपनी या कॉलेज में प्रोफेसर बनकर 10 से 6 या 10 से 3 शिफट वालेशानदार प्रोफेशन को चुना होता. मेरे उस मित्र ने घर की विशम परिस्थितियों के बावजूद इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशन को छोड कर पत्रकारिता को चुना. हर वक्त एक अनोखे जुनून से भरा वो फक्कड., दुनिया उसे पागल और बड.बोला कहती है. उसके बड.बोले पन या यूं कहें सच्चाई को बेबाकी से कह देने के रवैये के कारण ही पिछले दिनो उसे बिना किसी कारण नौकरी से निकाल दिया गया.
घर की विशम परिथितियों के बावजूद ना ही बेरोजगारी उसकी कमर तोड. पाई और ना ही उसके जोश को ठंडा कर पाई. इतना ही नहीं कभी उसके माथे पर एक शिकन तक नहीं आई. तब आखिरकार किस्मत को उसके आगे घुटने टेकने ही पड.े. आज वह एक अच्छे संस्थान में कार्यरत है और अपनी लड.ाई को जारी रखे है. विकट परिस्थितियों से उबर कर नये जोश से खडे होने की उसकी कोशिश ने मेरी आत्मा को झकझोरा और फिर से अपने जुनून अपने सपने को पूरा करने की भावना में कंपन पैदा हुई. तब फैसला किया सभी लाचारी, बेबसी और मजबूरी को पीछे छोड.कर सबसे पहले अपने पत्रकारिता चुनने के निर्णय और सपने को सार्थक करना है, फिर कलम से उस क्रांति का आहवान करना है, जिसकी आज के इंसान और समाज को सख्त जरूरत है. इसी उम्मीद से एक बार फिर अपना सफर शुरू करने जा रही हूं. आशा करती हूं आप सभी का सहयोग मिलेगा.

Tuesday, 16 June 2009

भारत की नौकरशाही सबसे भ्रष्ट

स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया' को आइना दिखाती रिपोर्ट

सर्वविदित है कि भारत में नौकरशाही का मौजूदा स्वरूप ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की देन है। देश की पराधीनता के दौरान इस नौकरशाही का मुख्य मकसद भारत में ब्रिटिश हुकूमत को अक्षुण्ण रखना और उसे मजबूत करना था। जनता के हित, उसकी जरूरतें और उसकी अपेक्षाएं दूर-दूर तक उसके सरोकारों में नहीं थे। नौकरशाही के शीर्ष स्तर पर इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी थे जो अधिकांशत: अंग्रेज अफसर होते थे। भारतीय लोग मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों के रूप में सरकारी सेवा में भर्ती किए जाते थे, जिन्हें हर हाल में अपने वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों के आदेशों का पालन करना होता था।लॉर्ड मैकाले द्वारा तैयार किए गए शिक्षा के मॉडल का उद्देश्य ही अंग्रेजों की हुकूमत को भारत में मजबूत करने और उसे चलाने के लिए ऐसे भारतीय बाबू तैयार करना था जो खुद अपने देशवासियों का ही शोषण करके ब्रिटेन के हितों का पोषण कर सकें। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के तहत तमाम महत्वपूर्ण बदलाव हुए। लेकिन एक बात जो नहीं बदली वह थी नौकरशाही की विरासत और उसका चरित्र। कड़े आंतरिक अनुशासन और असंदिग्ध स्वामीभक्ति से युक्त सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों का संगठित तंत्र होने के कारण भारत के शीर्ष राजनेताओं ने औपनिवेशिक प्रशासनिक मॉडल को आजादी के बाद भी जारी रखने का निर्णय लिया। इस बार अनुशासन के मानदंड को नौकरशाही का मूल आधार बनाया गया। यही वजह रही कि स्वतंत्र भारत में भले ही भारतीय सिविल सर्विस का नाम बदलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा कर दिया गया और प्रशासनिक अधिकारियों को लोक सेवक कहा जाने लगा, लेकिन अपने चाल, चरित्र और स्वभाव में वह सेवा पहले की भांति ही बनी रही। प्रशासनिक अधिकारियों के इस तंत्र को आज भी 'स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया' कहा जाता है। यह वर्ग आज भी अपने को आम भारतीयों से अलग, उनके ऊपर, उनका शासक और स्वामी समझता है। अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए यह वर्ग जितना सचेष्ट रहता है, आम जनता के हितों, जरूरतों और अपेक्षाओं के प्रति वह उतना ही उदासीन रहता है। इसका प्रमाण मिलता है पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी संस्था की रिपोर्ट से।हांगकांग की इस संस्था ने उत्तरी और दक्षिण एशिया के 12 देशों में कामकाज के लिहाज से भारतीय नौकरशाहों को सबसे निचली पायदान पर रखा है। भारत की नौकरशाही दर्जनभर एशियाई देशों में कामकाज के लिहाज से सबसे पिछड़ी और सुस्त है। यह बात पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी (पर्क) नाम की एक संस्था के सर्वेक्षण में सामने आई है। संस्था के सर्वेक्षण में पाया गया है कि भारतीय नौकरशाह राष्ट्रीय और राय स्तर पर खुद को सत्ता का केंद्र बना देते हैं। व्यवस्था में बदलाव की किसी भी कोशिश का ये नौकरशाह कड़ा विरोध करते हैं और इसका असर खुद उन पर और उनके कामकाज पर दिखाई देता है। संदेह और अपवादों की चपेट में आए नौकरशाही का पतन हो रहा है। नौकरशाही का जनसामान्य की समस्याओं और उनके निराकरण से मानो वास्ता खत्म हो गया है। आज हर कोई नौकरशाह किसी कार्य को या तो फंसाता दिख रहा है या उसे करने या कराने के लिए कोर्ट का सहारा ढूंढता नजर आ रहा है। कुछ भ्रष्ट राजनीतिज्ञों ने नौकरशाही को ऐसा बना दिया है कि उसकी सामाजिक कल्याण की इच्छा शक्ति और श्रेष्ठ प्रशासन की भावनाएं ही खत्म होती जा रही हैं। उनका ध्यान केवल अपनी नौकरी, शानदार सरकारी सुख सुविधाओं, विदेश भ्रमण और विलासित वैभव तक केन्द्रित रह गया है। नौकरशाह साफ-साफ कहता है कि उसका किसी से अगर वास्ता है तो अपने नफे नुकसान से। इस तरह देश की नौकरशाही ने नागरिक प्रशासन को अत्यधिक निराश किया है। देश के खजाने के अरबों रुपए इनकी ढपोरशंखी नीतियों और भ्रष्टाचार जनित रणनीतियों पर खर्च होते हैं। इन्हें देश में श्रेष्ठ नागरिक प्रशासन के लिए चुना गया था लेकिन ये भी भ्रष्ट राजनीतिज्ञों से भी बदतर होते जा रहे हैं। इनकी कार्यप्रणाली इतनी बदनाम और ध्वस्त है कि उस पर जनसामान्य भी यकीन करने को तैयार नहीं है। कुछ एक निम्न वर्ग की बात छोड़ दी जाए तो भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में समाज के सबसे संपन्न और प्रभुत्वशाली वर्गों के लोग ही आते रहे जो अपने संस्कारों से ही स्वयं को प्रभुवर्ग का समझते हैं। वे देश की सामाजिक-आर्थिक हकीकत और आम जनता की समस्याओं के प्रति कतई संवेदनशील नहीं होते। उनके अंदर यह भाव शायद ही कभी आता है कि एक लोकसेवक के रूप में उनका उत्तरदायित्व जनता की समस्याओं को प्रभावी रूप से दूर करने का प्रयास करना है।वे नहीं समझते कि देश के विकास की तमाम नीतियों और कार्यक्रमों को तैयार करने तथा उन्हें कार्यान्वित करने में सबसे अहम भूमिका उन्हीं की है। लेकिन यदि भारत की आम जनता आजादी के 59 वर्ष बीत जाने के बाद भी अपने को बदहाल महसूस कर रही है और विकास की किरणों से अपने को अब तक वंचित पा रही है तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हमारे नौकरशाह ही हैं। क्योंकि राजनेता तो कुछ ही अवधि के लिए सत्ता में आते हैं और जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरने पर चुनाव हारने के बाद सत्ता से बाहर हो जाते हैं, लेकिन नौकरशाह तो 30-35 वर्षों की लंबी अवधि तक अनवरत रूप से सत्ता में बने रहते हैं और समूचे कार्यपालिका तंत्र की असली बागडोर उन्हीं के हाथों में रहती है। अब तक की दस पंचवर्षीय योजनाओं में देश के विकास के नाम पर जनता से एकत्र किए गए राजस्व में से लाखों करोड़ रुपए व्यय किए गए हैं, लेकिन इस धनराशि का अधिकांश नौकरशाह, राजनेता, माफिया और बिचौलिये हड़पते रहे हैं। आम जनता तक उनका पूरा लाभ नहीं पहुंच पाता है और देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी विकास की पटरी से बहुत दूर है।भारत में अब तक हुए प्रशासनिक सुधार के प्रयासों का कोई कारगर नतीजा नहीं निकल पाया है। वास्तव में नौकरशाहों की मानसिकता में बदलाव लाए जाने की जरूरत है। विशेषकर उन अधिकारियों की मानसिकता में जो सीधे तौर पर जनता के साथ कार्य-व्यवहार करते हैं, क्योंकि सबसे अधिक अक्खड़, भ्रष्ट और गैर-जवाबदेह निचले स्तर के वे अधिकारी और कर्मचारी होते हैं जिनकी तैनाती जनता के साथ प्रत्यक्ष कार्य-व्यवहार वाले पदों पर की जाती है। जो अधिकारी निचले स्तर से पदोन्नति पाकर शीर्ष पदों पर पहुंचते हैं उनकी मानसिकता अपेक्षाकृत अधिक नकारात्मक और संकीर्ण हो जाती है। नौकरशाही के चरित्र में बदलाव लाने के लिए आम जनता को ही संगठित पहल करनी होगी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए। मीडिया और स्वैच्छिक संगठन इस अभियान में उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकते हैं।

Thursday, 19 February 2009

कहां लगाएं सुरक्षा की गुहार?

रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना बलात्कार, कानून की भाषा में एक बड़ा अपराध ही नहीं बल्कि समाज के भी रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना है। लेकिन बात जब गैंग रेप की हो, तो इसकी भयावहता का अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाता है। नोएडा में एमबीए की छात्रा से गैंग रेप की घटना से एक बार फिर राजधानी व इससे सटे उपनगरों में महिलाओं की सुरक्षा को आशंका के घेरे में ला कर खडा कर दिया है। उक्त घटना में छात्रा अपने सहपाठी युवक के साथ सेक्टर-38 ए स्थित मॉल 'ग्र्रेट इंडिया प्लेस' आई थी। शॉपिंग करने के बाद दोनों अपनी वैगनआर कार से घर जाने के लिए निकले। वहां से कुछ ही दूरी पर शाम के समय में तीन-चार बाइकों पर सवार युवकों ने उन्हें अगवा कर लिया और सुनसान स्थान पर ले जाकर लडक़ी का सामूहिक बलात्कार किया और लडक़े की जमकर पिटाई की। पुलिस द्वारा कराई गई मेडिकल जांच में छात्रा के साथ बलात्कार की पुष्टि के बाद सक्रियता दिखाते हुए सेक्टर-58 स्थित गढ़ी चौखंडी गांव में पुलिस की कई टीमों ने दबिश देकर कई आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। अब सवाल यह उठता है कि जब अपराधी शाम के समय सरेआम किसी की गाडी में घुसकर लडक़ी का सामूहिक बलात्कार कर देते हैं, तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चलने वाली मध्यम वर्गीय कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा का क्या हाल होगा। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित राजधानी के अस्पतालों में धडल्ले से हो रही भ्रूण हत्या व कम होने वाले लिंगानुपात को बढ़ाने के लिए भले ही लाडली जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू करने का काम कर रही हैं और पुलिस के आला अधिकारी राजधानी में महिला अपराध कम होने का दम भरते हैं, लेकिन राजधानी और एनसीआर में महिलाओं के साथ हो रही घटनाओं सरकार के बयानों की हवा निकाल रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1971 से बलात्कार मामलों में 678 प्रतिशत बढाेतरी हुई है। ये आंकडे सरकार के द्वारा किए गए तरह-तरह के दावे-प्रतिदावे की हकीकत बयान करने के लिए काफी हैं। ये दावे सिर्फ हाथी के दिखाने वाले दांत ही साबित हो रहे हैं। राजधानी की मुख्यमंत्री चाहती हैं कि बालिकाओं और महिलाओं को स्वच्छंदता के साथ जीने का अधिकार मिले। उनके साथ छेड़छाड़ न हो और पारिवारिक माहौल व उनकी सोच में बदलाव आए। मगर पुलिस के नकारात्मक रवैये के कारण दिल्ली की महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। चाहे वह राह-बाजार हो, आधुनिक शॉपिंग मॉल्स हों, सिनेमा घर हों, बस हो या फिर स्कूल-कालेज। हर स्थान पर महिलाएं असुरक्षित हैं। यहां आए दिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़, लूटपाट, बलात्कार, अगवा और हत्या जैसी घटनाएं घटित होती हैं। बावजूद इसके इनमें से अधिकांश छेड़छाड़ व चैन-झपटमारी की शिकायत दर्ज नहीं की जाती। यही वजह है कि दिल्ली देश के उन 35 शहरों में सबसे शीर्ष स्थान पर है जहां महिलाओं के साथ सर्वाधिक आपराधिक वारदातों को अंजाम दिया जाता है। यहां सबसे उल्लेखनीय बात यह भी है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ने भी अपने एक बयान में कहा है कि दिल्ली की महिलाएं थानों में भी सुरक्षित नहीं हैं। राजधानी में बढ़ते महिला अपराध को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो यह स्वयं सिध्द हो जाता है कि दिल्ली महिला अपराध में न केवल शीर्ष स्थान पर है बल्कि यहां की महिलाएं और गर्भस्थ बालिका शिशु सुरक्षित नहीं है। क्योंकि यहां दहेज को लेकर ही शिशु को जन्म देने से पहले कई महिलाओं की हत्या कर दी जाती है। वर्ष 2005 व 2008 के आंकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष यहां की करीब 27.1 प्रतिशत महिलाएं आपराधिक वारदातों का शिकार होती हैं, जोकि देश में होने वाली कुल आपराधिक घटनाओं का 14.1 प्रतिशत है। वर्ष 2005 में बलात्कार के 562 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि अगवा करने के 900, यौन शोषण के 197 और दहेज हत्या के 94 मामले दर्ज किए गए थे। ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2008 तक इन घटनाओं में दो गुणा से भी अधिक वृध्दि हुई है। उपरोक्त सभी आकड़े इस बात को साबित करते हैं कि दिल्ली में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं? यहां गौर करने वाली बात यह है कि समस्या की बात तो सभी करते हैं पर क्या कारण है कि महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में समाज, सरकार, पुलिस सभी नाकाम साबित हो रहे हैं। एक के बाद एक यौन शोषण, छेडछाड, बलात्कार के मामले हमारी पुलिस व्यवस्था व प्रशासन की पोल खोलती हैं। अब हालात यह हो गए हैं कि न केवल रात में बल्कि दिन में भी अपने परिजनों या मित्रों के साथ चलने में भी असुरक्षित हो गई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि समय के साथ भले ही सब कुछ बदल गया हो, पर महिलाओं के प्रति पुरुषों की मानसिकता और क्रूरता का रवैया अभी तक नहीं बदला है। वर्षों से चली आ रही पुरूष मानसिकता को तो समय के साथ धीरे-धीरे ही बदला जा सकता है। यदि पुलिस और कानून की लचर व्यवस्था में सुधार करके अपराधियों पर शिंकजा कसा जाए तो यकीनन अपराधियों में भय व्याप्त होगा। इस घटना से डर जाने या इस पर सिर्फ विलाप करने की बजाय हमें इसके तीन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा। पहला बिंदु पुलिस का रवैया है। जिन पुलिसकर्मियों ने अभियुक्तों को पकड़ने की त्वरित कार्रवाई की, उनका काम सराहनीय है। लेकिन ऐसी खबरें भी आई हैं कि पीड़ित छात्र पहले सेक्टर-20 के पुलिस स्टेशन में गए थे, जहां से उन्हें सेक्टर-58 का मामला बता कर टरका दिया गया था। इतनी बड़ी घटना के बाद बदहवास उन पीड़ितों की मदद सेक्टर-20 की पुलिस ने खुद आगे बढ़ कर क्यों नहीं की, इस बात की जांच होनी चाहिए। जितना जरूरी बलात्कारियों को दंड देना है, उतना ही जरूरी उन पुलिसकर्मियों को दंडित करना भी है। पुलिस का महकमा अपने ये दोनों चेहरे एक साथ नहीं रख सकता। उसे यह मानना होगा कि यह मानसिकता भी परोक्ष रूप से बलात्कारियों में ऐसे दुस्साहस को हवा देती है। इसलिए पुलिस और प्रशासन को जनहित में यह बात सार्वजनिक करनी चाहिए कि उन कर्तव्य का उचित ढंग से पालन न करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। दूसरा बिंदु अपने नौजवानों के बारे में हमारे समाज का मूल्यांकन का है। अब तक जो नौजवान इस कांड में पकड़े गए हैं, उनमें से एक बीबीए, एक बीसीए और एक बीएससी का छात्र है। इनके अलावा 2 हाई स्कूल में पढ़ रहे हैं। पिछले दिनों आतंकवादी गतिविधियों के लिए गिरफ्तार कुछ युवकों के बारे में यह जान कर हमारा समाज हतप्रभ रह गया था कि उनमें से कुछ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे या प्रोफेशनल थे। तब सवाल उठाया गया था कि परिवार और समाज इन बच्चों की कैसी परवरिश कर रहे हैं। उसके बाद से बैंक डकैती और लूटपाट में भी ऐसे कई उच्च शिक्षित प्रोफेशनल पकड़े जा चुके हैं। इसलिए परवरिश का सवाल पीछे छूट गया है। अब इसकी पहचान भी जरूरी है कि जिन बुराइयों को लेकर हम सबसे ज्यादा उत्तेजित रहते हैं, उनमें से कितने ऐसे हैं जो इस बलात्कार से ज्यादा घातक हैं। तीसरा बिंदु यहां का वह ग्रामीण समाज है, जिसकी पंचायतें प्रेम करने के आरोप में अपने नौजवान बच्चों के टुकड़े-टुकड़े कर डालती हैं। क्योंकि इस बलात्कार के लिए गिरफ्तार ज्यादातर नौजवान एक ही गांव गढ़ी चौखंडी के हैं। निश्चित रूप से उस गांव के बुजुर्गों, वहां की पंचायतों और वहां की मांओं से भी यह जानना चाहिए कि इस बलात्कार के बारे में उनकी क्या राय है और वे क्या सजा तजवीज करते हैं। क्या वह गांव इतना शर्मसार होगा कि बचाव के लिए वहां का कोई शख्स खड़ा नहीं होगा? इन सभी पक्षों पर विचार करने का मतलब है आत्म निरीक्षण, क्योंकि नैतिकता उपदेश के माध्यम से नहीं थोपी जा सकती। एक अपराध और उसके लिए जिम्मेदार दोषियों की सजा से सिलसिला खत्म नहीं होता, यह जानना जरूरी है कि ऐसे अपराध करने वालों को भय क्यों नहीं लगता। अक्सर यह होता है कि कुछ ऊंचे तबके के युवक अपनी दौलत के बल पर ये अपराध करने से नहीं डरते। उन्हें लगता है कि पैसे के दम पर सारे मामले को रफा दफा कर दिया जाएगा। और ज्यादातर होता भी ऐसा ही है। पुलिस व कानून की लचर व्यवस्था को ढाल बनाकर अपराधी इन कुकृत को अंजाम देते हैं। इस तरह के मामलों में यदि पुलिस शीघ्र व सख्त कार्रवाई करे तो निश्चित रूप से अपराधियों के हौंसले पस्त होंगे।

क्या निश्चित हो पाएगी बेटी की सुरक्षा

बालिका दिवस24 जनवरी राष्ट्रीय बालिका दिवसबालिकाओं के सर्वांगीण विकास तथा उनके प्रति सकारात्मक सोच एवं आर्थिक निर्भरता लाने के लिए महिला बाल विकास मंत्रालय ने 24 जनवरी को प्रति वर्ष राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। इस दिन को बालिकाओं को समर्पित करने के लिए मंत्रालय ने विशेष प्रतीक चिन्ह भी जारी किया है। भारत में महिलाओं की महत्ता को दर्शाने और उनके सशक्तिकरण के लिए महिला दिवस पहले से ही मनाया जाता रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय बालिका दिवस की उपयोगिता और प्रभाव के बारे में चर्चा अनिवार्य है। पहले से चल रही अनेक योजनाओं की पहुंच और उसके लाभ पर गौर करें कहा जा सकता है कि सरकारी नीतियों और योजनाओं में तो कहीं कोई कमी नहीं हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन और निगरानी में कुछ कमी अवश्य है जिसकी वजह से देश में बालिकाओं की स्थिति में ज्यादा सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। आज भी देश के हर कोने में महिला और पुरुषों में भेदभाव बरकरार है। अनपढ क़े साथ-साथ पढे लिखे वर्गों में भी यह भेदभाव देखा जा सकता है। राजधानी दिल्ली की बात करें तो कह सकते हैं कि महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाओं में वृद्धि हुई है। अगर कुल घटनाओं को देखा जाए तो आधे से ज्यादा मामलों में मासूम बच्चियां ही शिकार बनती हैं। सरकार द्वारा कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए कई प्रयास किए गए परंतु आज भी स्थिति यह है कि गांवों और शहरों में कन्या भ्रूण हत्या बदस्तूर जारी है। यदि सरकारी आंकड़ों पर गौर किया जाए तो भारत सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की बाल अधिकार समिति को प्रेषित रिपोर्ट में आया है कि प्रत्येक वर्ष 1 करोड़ 20 लाख बालिकाएं जन्म लेती हैं जिनमें से 30 लाख बच्चियां अपना 15वां जन्मदिन नहीं देख पातीं और उस के पहले ही काल का ग्रास बन जाती हैं। इनमें से एक तिहाई जन्म के प्रथम वर्ष में ही मर जाती हैं। यह आकलन किया गया है कि प्रत्येक छठी महिला की मृत्यु का कारण लिंग-भेद है। बालकों की अपेक्षा, नवजात बालिकाओं में प्रतिरोध क्षमता अधिक होती है। समान रूप से विपरीत परिस्थितियों में नवजात बालिकाओं की संक्रमण से लड़ने और जीवित रहने की संभावनाएं नवजात बालकों से अधिक होती है। यह विचार अनेक अध्ययनों से सही भी साबित हुआ है।लेकिन उसके बावजूद (एस.आर.एस. सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम द्वारा 2005 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार) जन्म लेने वाले 1000 स्त्री-शिशुओं में से 61 की मृत्यु हो जाती है। विगत एक सौ वर्षों से भारत की जनसंख्या के लिंग अनुपात में लगातार स्त्रियों की कमी होती रही है। 1901 की राष्ट्रीय जनगणना में स्त्री-पुरुष अनुपात 1000 पुरुषों के मुकाबले 972 स्त्रियों का था। बाद की प्रत्येक जनगणना बताती है कि स्त्री-पुरुष अनुपात में स्त्रियों की संख्या उत्तरोत्तर कम होती गई है। 1991 की जनगणना में 1000 पुरुषों पर 927 स्त्रियां थीं। जो 2001 की जनगणना में बढ़ कर 933 हो गई हैं। इस तरह यहां स्त्रियों की संख्या में कुछ वृध्दि अवश्य होती दिखाई दी थी।लेकिन 1991 में 6 वर्ष तक के बच्चों में लिंग अनुपात प्रति हजार बालकों पर 945 बालिकाओं का था, जो कि 2001 में घट कर मात्र 927 रह गया। इस तरह एक दशक में 18 बालिका प्रति हजार कम हो गई। राजधानी के पॉश इलाकों और झुग्गियों में यह अनुपात क्रमश: 919 और 857 ही रह जाता है। स्पष्ट है कि यह कारनामा वहां हो रहा है, जहां लोग होने वाली संतान के लिंग का चुनाव करने में अर्थ-सक्षम हैं और तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। यहां इस बात की कोई निश्चितता नहीं कि एक लड़की जो भ्रूण हत्या, और शिशु हत्या से बच गई है और आदतन उपेक्षा-चक्र की शिकार नहीं होगी, जो उस की मृत्यु का कारण बन सकता है, क्योंकि उसे भोजन कम मिलेगा। दुनिया को जानने के अवसरों के स्थान पर उसे किसी काम में ठेल दिया जाएगा और उसके स्वास्थ्य और चिकित्सा भगवान भरोसे रहेगी। दयनीय है कि सरकारी और सामाजिक स्तर पर कन्याओं के विकास व सुरक्षा के लिए किए जा रहे भरसक प्रयासों के बावजूद स्थिति यह है। अब देखना यह है कि 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस घोषित करने के बाद क्या आजाद भारत की बेटी की सुरक्षा निश्चित हो पाएगी।

संस्कृति की ये कैसी हिफाजत?

कर्नाटक के मंगलोर क्षेत्र में पब में लड़कियों के साथ हुई बदसलूकी के बाद नेताओं में 'पब संस्कृति' को लेकर बहस छिड़ गई है। भाजपा शासित कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने साफ कहा कि वह राज्य में 'पब संस्कृति' को नहीं पनपने देंगे। देश में उन्मुक्त जीवन शैली के प्रसार के कारण समाज में अपनी अहमियत पाए लोगों के दबाव में सकुचाए कर्नाटक के भाजपाई मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने भी अब राय में पब संस्कृति के नहीं बढ़ने देने का बयान दे दिया है। मंगलोर के एक पब में 24 जनवरी को शराब पीकर नाच-गा रही लड़कियों की श्रीराम सेना के कार्यकताओं द्वारा पिटाई के बाद जिस प्रकार चारों ओर से एक वर्ग ने शोर मचाना शुरू किया उससे मूल मुद्दा ही ओझल हो गया। महिलाओं के साथ दर्ुव्यवहार का मुद्दा अब पब संस्कृति और भारतीय संस्कृति का रूप ले चुका है। कांग्रेस शासित दो राज्यों के मुख्यमंत्री भी इस बहस में कूद पड़े हैं। येदियुरप्पा ने कहा, हम कर्नाटक में पब संस्कृति को मजबूत होता नहीं देख सकते। लेकिन कानून हाथ में लेने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा। येदियुरप्पा ने श्रीराम सेना पर प्रतिबंध लगाने के सवाल पर कोई सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इस बारे में पुलिस और मंत्रिमंडल के सदस्यों से चर्चा की जाएगी। श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा लडक़ियाें को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया था और उनके साथ दर्ुव्यवहार किया गया था। येदियुरप्पा का बयान ऐसे समय आया है जब श्रीराम सेना के प्रमुख प्रमोद मुत्तालिक ने भाजपा को याद दिलाया है कि राज्य में उसकी सरकार हिन्दुत्व के एजेंडे पर ही बनी है। मुत्तालिक ने सरकार से यह भी कहा था कि राजनीतिक फायदे की खातिर हिन्दूवादी संगठनों को परेशान न किया जाए। मुत्तालिक को पब पर हुए हमले के मामले में आरोपी बनाया गया है। बहरहाल, 'पब संस्कृति' पर बहस में दो और राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हो गए हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इसके खिलाफ राय दी है। गहलोत ने यह भी कहा कि वह मॉल में लड़के-लड़कियों को हाथ में हाथ डाले खुले आम घूमने-फिरने की संस्कृति बंद कराना चाहते हैं। भाजपा ने गहलोत के इस बयान को रूढ़िवादी बताया है। उधर, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इतर राय दी है कि पब में जाने वाले बालिग युवा व युवतियां इतने परिपक्व है कि वे अपना निर्णय ले सकें। उन्होंने कहा कि अगर लड़के-लड़कियां साथ-साथ बाहर जाती हैं, तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। इतना ही नहीं राष्ट्रीय महिला आयोग स्थिति का जायजा लेने के लिए एक टीम कर्नाटक भेज रहा है। आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने कहा है कि आयोग ने तीन सदस्यों की एक टीम बनाई है जो कर्नाटक जाएगी और हमला का शिकार हुए लोगों से मिलने के साथ-साथ स्थिति का आकलन भी करेगी।यहां गौर करने वाली बात यह है कि मार-पिटाई या विरोध के हिंसक तरीके की आलोचना और पब से जुड़ी अपसंस्कृति दोनों अलग-अलग बातें हैं। पश्चिम से आयातित यह जीवन शैली भारत के आम समाज को स्वीकार्य नहीं हो सकती। ऐसे में इसकी आलोचना की बजाय इस पर सकारात्मक नजरिए से विचार किया जाना चाहिए। इसमें किसी की निजी स्वतंत्रता बाधित करने या निजी जीवन में हस्तक्षेप का प्रश्न नहीं है। वैसे युवक-युवतियों के प्रेम प्रदर्शन एवं पब की अपसंस्कृति के बीच बिल्कुल अन्योन्याश्रिय संबंध नहीं है। पब संस्कृति और महिलाओं पर अपने विचार थोपने का अनुचित तरीका ये दोनों अगल-अलग बातें है। गौरतलब है कि मंगलोर की घटना की चारों तरफ निंदा हुई है। केंद्र सरकार की एक मंत्री ने इस घटना को 'भारत का तालिबानीकरण' तक करार दिया। राज्य सरकार इस मामले में हुई अब तक की कार्रवाई को लेकर भी निशाने पर है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)के दबाव के आगे झुकने का आरोप लगाया जा रहा है। हालांकि उन्होंने इन आरोपों को गलत बताया है और यह भी कहा है कि श्रीराम सेना का भाजपा से कोई संबंध नहीं है। ऐसे में देखना यह होगा कि राज्य सरकार आरोपियों के खिलाफ किस प्रकार की कार्रवाई करती है।और राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उठ रहे विवादों का किस प्रकार निपटारा करती है। हालांकि राज्य सरकार दबाव में ही सही लेकिन आरोपियों को गिरफ्तार करने का काम तो कर ही दिया है। अब देखना है कि इन आरोपियाें पर कानून का डंडा कितना चलता है।